अपनी संख्या बल के आधार पर चाहे भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली नेशनल डेमोक्रेटिक एलांयस (एनडीए) की सरकार ने देश के वक्फ़ कानून में अपनी मर्जी का बदलाव करने में सफलता पा ली हो, लेकिन जो संदेश इसे पारित करने के लिये, खासकर लोकसभा में हुए मतदान ने जनता को दिया है उससे सम्भवत: देश के अल्पसंख्यकों को यह जानने में मदद मिलेगी कि उनकी जगह क्या है, उनके खैरख्वाह कौन हैं और कौन अहित चाहते हैं। लोकसभा ने बुधवार को 288 के मुकाबले 232 वोटों के बहुमत से वक्फ़ संशोधन विधेयक, 2024 को पारित कर दिया तथा गुरुवार को राज्यसभा में दिन भर से इस पर चर्चा जारी है। इस सदन में 236 सदस्य हैं। बिल को पास करने के लिये 119 सदस्य चाहिये जबकि भाजपा के इसमें 98 सदस्य हैं। लोकसभा में इस विधेयक के पक्ष में विरोधी खेमे के 5 सदस्यों के वोट पड़े थे। राज्यसभा में भाजपा आवश्यक आंकड़ा प्राप्त करती है या नहीं, यह देखना होगा। हालांकि इस सदन में प्रस्ताव गिर भी जाये तो भी सरकार को फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि बाद में उसे दोबारा भेजकर संवैधानिक नियमों के तहत पारित करा ही लिया जायेगा। इसे उच्च सदन पूरी तरह से रोक नहीं पायेगा।
इस कानून के एक तरह से अस्तित्व में आ जाने के बाद अब वक्त है कि अल्पसंख्यक, विशेषकर मुस्लिम सोचें कि उन्हें आगे क्या करना है। यह ऐसा समय है जब उन्हें समझना होगा कि कौन से राजनीतिक दल और व्यक्ति उनका वाकई भला चाहते हैं और किन दलों ने इस विधेयक को पारित कराने में सहयोग देकर उन्हें कमजोर करने का मार्ग प्रशस्त किया है। वैसे तो मतदान का जो पैटर्न दिखा तथा विधेयक के पक्ष-विपक्ष में जो तर्क दिये गये, वे बता देते हैं कि कौन सा दल उनके पक्ष में खड़ा है। कोई यह न सोचे कि यह पैटर्न वक्फ़ कानून पर मतदान तक ही सीमित रहेगा। पहली बार 8 अगस्त, 2024 को जब यह विधेयक संसद में पेश हुआ था, तब उस पर हुई चर्चा, तत्पश्चात उसे संयुक्त संसदीय समिति में भेजे जाने तक कुछ दलों का रवैया आश्चर्यजनक ढंग से तथा उम्मीदों के विपरीत भाजपा के प्रति सहयोगात्मक रहा। ये वे दल हैं जो वक्फ़ कानून पर सरकार से बात कर सकते थे। इनमें से कम से कम दो तो ऐसी पार्टियां हैं ही जो अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षक मानी जाती रही हैं और उन्हीं पर सरकार टिकी हुई है। यदि एक बार भी वे समर्थन वापसी की धमकी देते तो यह विधेयक भाजपा सरकार अलमारी में बन्द कर देती। ये दोनों दल हैं- आंध्रप्रदेश की तेलुगु देसम पार्टी और बिहार की जनता दल यूनाइटेड जिसके क्रमश: 16 और 12 सदस्य हैं। दोनों ही अल्पसंख्यक समर्थक पार्टियां कहलाती हैं लेकिन इस विधेयक को उनके मिले समर्थन ने यह भरम तोड़ दिया।
इस विधेयक पर चर्चा ने सियासी समीकरणों को तथा सत्ता के लिये विचारधारा की कुर्बानियों को और भी स्पष्ट कर दिया है। इस कानून को पारित कराकर भाजपा यह बताने में कामयाब रही है कि इस लोकसभा के चुनाव में उसे चाहे कम सीटें मिली हों लेकिन जनता अब भी उसके साथ है तथा एनडीए को कोई खतरा नहीं है। जेडीयू व टीडीपी के सांसदों के अलावा राष्ट्रीय लोक दल के जयंत चौधरी, हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के जीतनराम मांझी एवं जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के चिराग पासवान से भी अल्पसंख्यकों व धर्मनिरपेक्षता में यकीन करने वालों को उम्मीद थी कि वे उनके पक्ष वाली लाइन पर चलेंगे लेकिन वे भी सरकार के साथ रहे। इनमें से कई मंत्री व सांसद तो अपने भाषणों में भाजपा ही नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी मात देते हुए नज़र आये।
कोई यह न समझे कि संदेश केवल अल्पसंख्यकों से सम्बन्धित इस विधेयक तक ही सीमित है। यही हाल दलितों व ओबीसी से सम्बन्धित किसी भी फैसले के वक्त होगा- फिर चाहे वह उनके खिलाफ ही क्यों न हो। यह अवसर न केवल अल्पसंख्यकों को राजनीतिक विचारधारा तथा सियासी दलों के साथ अपनी प्रतिबद्धता पर पुनर्विचार करने का है, बल्कि दलितों, अन्य पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों और आदिवासियों के बारे में यह कहा जा सकता है। सत्ता सुख के लिये ये पार्टियां वक्फ़ कानून को समर्थन दे सकती हैं तो आश्चर्य नहीं होगा अगर ये दल दलितों, ओबीसी और आदिवासियों के हितों पर कुठाराघात करने वाले निर्णयों पर भी सरकार का साथ दें।
इस विधेयक ने अल्पसंख्यकों, दलितों, ओबीसी तथा आदिवासियों को यह सोचने का अवसर भी दिया है कि वे देखें कि उन्होंने अपनी नुमाइंदगी किन लोगों और सियासी दलों के हाथों में सौंप रखी है। एनडीए के उन दलों को वक्फ़ कानून पर न्यूनतम सतर्कता बरतनी चाहिये थी जिनका सामाजिक न्याय में विश्वास है, परन्तु वे यदि वक्फ़ कानून में आये इन बदलावों के दुष्परिणामों को समझने में नाकाम हैं तो उनसे उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे आगे किसी भी मामले में नरेन्द्र मोदी को आंखें दिखा सकेंगे। इस विधेयक के पारित होने से विपक्षी गठबन्धन की एकता की आवश्यकता पुन: प्रतिपादित हुई है। पहले कई बार सोचा जाता था कि अल्पमत वाली मोदी सरकार अल्पसंख्यकों, दलितों, ओबीसी, आदिवासियों आदि से सम्बन्धित कानूनों व प्रावधानों को छूकर अपने लिए मुसीबत मोल नहीं लेगी; लेकिन इस सफलता से वह उत्साहित होकर संविधान से बड़ी छेड़छाड़ भी कर सकती है।